मंगलवार, 31 जनवरी 2017

गीतांबरी -मधुकर गौड़

पंडित मधुकर गौड़ एक अनूठे गीतकार हैं। हिन्दी गीतिधारा के महत्वपूर्ण रचनाकार, श्रेष्ठ सम्पादक और आदरणीय व्यक्तित्व के रूप में पंडित मधुकर गौड़ की काव्य–सृजन क्षमता को साहित्य का प्रत्येक पाठक जानता भी है और मानता भी है।  वे आज हिन्दी क अग्रिम पंक्ति के गीतकारों में से एक हैं।  पिछले पचास सालों से उनकी गीत–सर्जना और लगभग तीन दशकों से उनके द्वारा सतत संपादित पत्रिका 'सार्थक' के द्वारा 'गीत' विधा को संरक्षित व विकसित करने का कार्य उन्होंने जारी रखा है। उनके सभी गीत संग्रह उनकी काव्यसाधना की उपलब्धियाँ हैं। कहा जाता है कि  वे गीत लिखते नहीं अपितु गीत को जीते हैं। गीतों के अतिरिक्त उन्होंने अन्य काव्य विधाओं में भी रचना की है। उनकी सभी गजलें, दोहे व कविताएँ भी प्रभावपूर्ण होती हैं, जो पाठक के हृदय को उद्वेलित किये बिना नहीं रहतीं।

हाल ही में उनके अब तक प्रकाशित सभी गीत संग्रह, दोहा संग्रह, गजल संग्रह तथा कविता संग्रह को एक पुस्तक में संकलित करके 'गीताम्बरी' नाम से ७४० पृष्ठों का एक वृहद् काव्य–समग्र प्रकाशित हुआ है, जो उनके गीतों की यात्रा की लगभग सम्पूर्ण गाथा प्रस्तुत करता है। अपवाद स्वरूप इसमें केवल एक संग्रह 'गीतवंश' को अलग रखा गया है, जिसे महाराष्ट्र साहित्य अकादमी का पुरस्कार प्रदान किया गया था।
 
उन्होंने विपुल मात्रा में गीत लिखे हैं। इन गीतों की अंतर्वस्तु और उसके बदलते रूप के विषय में उनके विभिन्न स्थानों पर व्यक्त किए गए विचारों से, उनकी गीतास्था का पता चलता है। साथ ही उनके जीवन और लेखन के बारे में भी अनेकानेक वरिष्ठ कवियों व लेखकों ने अपने महत्वपूर्ण लेखों के माध्यम से इस पुस्तक में अपने विचार व्यक्त किए हैं।

मधुकर जी के समकालीन और ख्याति–प्राप्त गीतकार पं.रमानाथ अवस्थी ने लिखा है–"भारत के जिन सुधी रचनाकारों ने गीत के लिए काम किया है, उनमें मधुकर गौड़ का नाम और काम गीत के इतिहास में सुरक्षित रहेगा।" हिन्दी नवगीत के अग्रणी रचनाकार पं .देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र' ने अपने लेख में लिखा है –"जहाँ–जहाँ गीत और गीतकारों का प्रसंग चलता है वहाँ श्री मधुकर गौड़ का सदंर्भ और उल्लेख अब एक अनिवार्यता बन चुका है। इस स्थिति तक आने के लिए मधुकर जी ने जो अविराम साधना की है, वह अभिवंदनीय और अनुकरणीय है। वे वज्र–निश्चय के धनी हैं. जो कह दिया, सो कह दिया, जो ठान लिया सो ठान लिया,  फिर चाहे कोई   (((प्रत्यवाय या कसौ)))   भी अंतराय आए, वे अपने 'कथिम् को सुकृतम' के रूप में परिणत करके ही चैन की साँस ले पाते हैं।" प्रसिद्ध गीतकार महेश अनघ का कहना है कि "गीतलता का अमृतकुण्ड मधुकर गौड़ की नाभि में बसा है। केवल आकार से गीत होता तो शब्दों की टक्कर से कभी का टूट–फूट गया होता। लेकिन वे गीत के भाव जगत को जीते हैं।"

नवगीत के सशक्त हस्ताक्षर सत्यनारायण ने उनकी रचनात्मकता पर कहा –"मधुकर गौड़ का जुझारू गीत–व्यक्तित्व गीत के प्रति उनकी अकंप आस्था, निर्बाध निष्ठा तथा सृजन संकल्प से भरा–भरा है। गीत उनकी धमनियों में रक्त की तरह प्रवाहमान है, धड़कन की तरह सजीव है और है आकांक्षा की तरह दीप्त।  मधुकर गौड़ के लिए भाई माहेश्वर तिवारी की यह उक्ति अकारण नहीं है कि 'आप केवल, गीत ही नहीं समूची कविता के अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।' मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि आज की तारीख तक मधुकर गौड़ नाम के इस संकल्पनिष्ठ, गीतव्रती व्यक्ति के समानांतर कोई नाम दूर–दूर तक दिखाई नहीं पड़ता।" वरिष्ठ गीतकार  कुमार रवीन्द्र कहते हैं- "भाई मधुकर गौड़ मानुषी आस्था के गीतकार हैं और उस आस्था में ललकार है, रिरियाहट नहीं। ओज उनका मूल भाव है। चोट खाने पर वे चिल्लाते हैं, ललकारते हैं, मारक व्यंग्य करते हैं, आक्रामक नाद करते हैं।

उनकी कविता की दूसरी विशेषताएँ हैं, उनकी जिजीविषा यानी जीवन  खुलकर जीने, उसमें सुख लेने, संघर्ष–सतत संघर्ष करते रहने की प्रबल एवं उत्कट अभिलाषा।  वे तो मनुष्य के उत्साह, उनके उल्लास के कवि हैं।  कुमार रवीन्द्र आगे कहते हैं कि मधुकर गौड़ गीतिकवि हैं। और उनके गीतों में अक्सर और अधिकांशतः जीवन के राग तत्व की अवृत्ति हुई है। यह राग तत्व मानुषी, आस्था विशेष रूप से कविता की आस्था का प्राणतत्व है। मधुकर गौड़ इसी प्राणतत्व  के गायक कवि हैं। मैंने उन्हें गीत गाते हुए सुना है और उनके स्वरों के आरोह–अवरोह में इसी आस्तिक राग–तत्व की झंकार मुझे मिली है, जिसमें आज से क्षरित विलुप्त होती हृदय–राग की विविध मुकरियाँ लगातार गूँजती मिलती हैं। जगीकार और समीक्षक श्री नचिकेता का मानना है कि, "मधुकर गौड़ द्वारा प्रस्तावित 'गीत–नवांतर' की अवधारणा बिल्कुल वैज्ञानिक, तथ्यपरक, युक्ति संगत और तार्किक प्रत्यय है। गीत पर व्यक्त मधुकर गौड़ की चिन्ता उनके विकासशील सोच और प्रयत्नों का सार्थक नतीजा है।

उपभोक्तावादी और विश्वबाजार संस्कृति के सृजन–विरोधी माहौल में एक सृजनशील गीतकार और कुशल संपादक के रूप में मधुकर गौड़ का दीर्घकालिक अवदान हिन्दी गीत जगत की अमूल्य निधि है।  मधुकर गौड़  का सम्पूर्ण रचनात्मक संघर्ष गीत की अस्मिता और अस्तित्व की प्रतिरक्षा में सक्रिय सृजनात्मक संघर्ष और गीत विरोधियों के खिलाफ प्रतिरोधात्मक कार्यवाई का दायर संजीदा हलफनामा और मूल्यांकन का नया घोषणा पत्र है। "प्रो. विद्यानन्दन राजीव के शब्दों में– "मधुकर गौड़ वर्तमान हिन्दी–गीत के सामर्थ्यवान रचनाकार हैं। उनके गीतों में गीत–नवांतर की अवधारणा के अनुरूप नवगीत के सभी संसाधनों का उपयोग हुआ है।  कवि ने अपने गीतों की अंतर्वस्तु को युगीन यथार्थ के फलक पर प्रतिष्ठित किया है।  आदमी की चुकती हुई संवेदना से उत्पन्न होने वाले भयावह दृश्य भी उनके गीतों में देखे जा सकते हैं।  मजहब और संप्रदाय के नाम पर बिखरते हुए समाज के प्रति उनकी चिन्ता मानव के सामाजिक सरोकार को रेखांकित करती है। इस प्रकार समाज को जोड़े रखने का प्रयास उनकी रचनाओं में अभिव्यक्त हुआ है। नए प्रतीकों और चाक्षुष बिंबों से अलंकृत उनकी सहज, सरल भाषा संप्रेषण को धारदार बनाने मे सफल रही है।"

'गीताम्बरी' में संकलित उपरोक्त विद्वानों के विचारों के इन अंशों को यहाँ उद्धृत करने के पीछे मेरा उददेश्य केवल यही है कि जब हम उनके सम्पूर्ण रचनाधर्म पर एक साथ निगाह डाल रहे हैं तब समय–समय पर उनके संग्रहों पर कहे गए ये विचार उनकी व्यापक रचनात्मकता को समझने में हमारी सहायता करते हैं।

'गीताम्बरी' को मैं आद्योपान्त पढ़ गया। इसे पढ़ना मेरा विशिष्ट अनुभव रहा । इसमें पुनर्संकलित सभी गीत संग्रहों को एक साथ पढ़ना उनके विस्तृत रचनासमय की परिक्रमा करना जैसा लगा। अब मैं निस्संकोच कह सकता हूँ कि वे  हिन्दी–गीत कविता के एक मौलिक और विलक्षण रचनाकार हैं। ऐसा लगता है जैसे वे जन्म से ही कवि हैं, गीतकार हैं। उनके गीत स्तरीय भावपूर्ण हैं। कारण यह था कि मुझे उनकी रचनाएँ मार्मिकता और वैविध्यपूर्ण लगीं। विविध भावभूमियों पर गीत–सर्जना में वे सिद्धहस्त हैं, गीत के अतिरिक्त उन्होंने अन्य विधाओं में भी बहुत लेखन किया। हैरत यह कि लेखन में इतनी विविधता, फिर भी इतने विपुल साहित्य की रचना।  उनका बहुआयामी व्यक्ति हमें प्रभावित किए बिना नहीं रहता है।  आश्चर्य की बात है कि अधिक दुहराव नहीं मिलता है और नित्यनूतनता मिलती है इनके गीतों में उनके गीतों में काव्यतत्व और शिल्प की विशिष्टता मिलती है।  उनकी गीत पंक्तियाँ हमारे मन को बाँध लेती हैं। ये कविताएँ पाठक को प्रभावित किए बिना नहीं रहतीं क्योंकि गौड़ जी के गीतों में  भारतीयता रची–बसी है।  भारतीय संस्कृति के दर्शन यहाँ सर्वत्र मिलते हैं।  उनके गीतों में मानवीय मूल्यों के प्रति गहरी आस्था है।  उनके गीतों में रूमान का भाव बना रहता है जो भारतीय जीवन का अपरिहार्य अंग है।

उनके काव्य में समकालीन समय की ईमानदार अभिव्यक्ति हुई  है।  उन्होंने जो भोगा, जो अनुभव किया वही अपने गीतों में उतारा है। सामाजिक सरोकार के प्रति सजग हैं। वे निरुद्देश्य नहीं लिखते। लम्बा अनुभव संसार उनके पास है।  उनकी यह गीत यात्रा भारतीय जीवन के अनेक दौर से गुजरी है। समाजिक राजनीतिक और सांस्कृतिक उथल पुथल के उन्होंने अनेक मोड़ देखे हैं जो उनकी रचनात्मकता में स्पष्ट देखे जा सकते हैं।  यहाँ अमानवीय यथार्थ की अनुभूति से उपजी बेचैनी है तथा इसके खिलाफ  चुनौती या प्रतिकार का स्वर भी स्पष्ट देखा जा सकता है। वे एक जझारू व्यक्तित्व हैं।  मधुकर गौड़ के गीतों में आम अदमी का दुख दर्द पूरी शिद्दत से उजागर होता है।  वे केवल सामाजिक राजनीतिक विसंगतियोँ को बता कर चुप नहीं रहते बल्कि विरोध करते हैं प्रतिरोध करते हैं।  समाज में व्याप्त अन्याय के विरुद्ध वे आवाज उठाते हैं। इन गीतों में उनकी प्रामाणिक  व विश्वसनीय अभिव्यक्ति हुई है।

मधुकर गौड़ एक कवि भर नहीं, बल्कि एक गीत–अभियान का भी नाम है। हिन्दी की रागात्मक एवं छान्दस गीत–धारा के समर्पित कवि हैं, मधुकर गौड़। इस दिशा में उन्होंने सराहनीय कार्य किया है।  इस अगीत के दौर में गीत को एक आन्दोलन का रूप देने में गौड़ जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वे वास्तव में कविता को बचाकर रखने वाले कवि हैं।  इसीलिए प्रो .उदयभानु हंस ने उन्हें 'गीत गंगा का नया भगीरथ' कहा है, जो सटीक भी है।  चारों ओर कविता में अराजकता का वातावरण है, गीतों पर अकविता के हर तरफ से हमले हो रहे हैं, ऐसे घटाटोप में जनता के बीच सरस कविता पहुँचाते रहने के लिए गौड़ जी  संकल्पित हैं। तभी तो इस बुद्धिवादी और अनास्था के दौर में भी उन्होंने आस्था और हृदयमर्मी गीत–धारा प्रवाहित की। हिन्दी कविता के इस विराट अँधेरे में एक प्रकाशस्तंभ की तरह वे निरन्तर गीत–रचना में रत रहे। उनके गीत रागात्मकता को अभिव्यक्त करते हुए जीवन को सरस बनाते हैं और उदास क्षणों में मन को उमंग और ताजगी प्रदान करते हैं।

सपांदन के अतिरिक्त उन्होंने गीत–रचना हेतु नई पीढ़ी को प्रोत्साहित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। यह उनकी पहल ऐतिहासिक रही है और समायनुकूल गीत की विकास–यात्रा को नया मोड़ देती रही है।  दरअसल गौड़ जी  वर्तमान का मिजाज समझने में पूर्णतः सफल रहे हैं।  वे सचमुच जीवन से प्रतिबद्ध गीतकार हैं और निसंदेह वे एक सशक्त कवि के रूप में हमारे सामने आते  हैं। एक श्रेष्ठ गीतशिल्पी के रूप में हमारे सामने आते हैं। जब हम उनके गीतों को शिल्प की दृष्टि से देखते हैं तो पाते हैं कि इनको गीतों की बनावट और बुनावट में कलात्मकता  भरपूर है। उन्होंने इसमें नए शिल्प और नए विधान को जन्म दिया है। नए प्रतीक और बिम्बों का बहुतायत से प्रयोग मिलता है, जिससे इन गीतों की आभा और भी बढ़ जाती है। यही कारण है कि इनके गीत कथ्य और शिल्प में अपनी अलग पहचान रखते हैं।  इन रचनाओं में भाषा की सहजता, प्रांजलता और प्रवाह बना रहता है। वे भाषिक सरलता से अपने गीतों को संप्रेष्य बनाते हैं।  सटीक और सुलझे हुए बिम्ब और प्रतीक उनकी विशेषता है। अपने सार्थक बिम्बों के सहारे वे अपने कथ्य को अधिक प्रभावपूर्ण बनाने का प्रयास करते हैं। इन गीतों में समाज के अंतर्विरोध, उनकी समस्यायें, विडम्बनाएँ इस तरह से व्यक्त हुई हैं कि ये पाठक को आत्मीय लगने लगती हैं।

 इस ग्रन्थ में हम पाते हैं कि मधुकर जी ने गीत विधा के प्रति अटूट सर्मपण और अटूट निष्ठा का परिचय दिया है। उनका संपूर्ण काव्य–व्यक्तित्व गीत–साधना से ओतप्रोत है।  उनके गीत उनकी सामाजिक चेतना एवं रचनाधर्मिता को अभिव्यक्त करते हैं। अपनी रचनाशीलता को बनाए रखते हुए जिस समर्पण भाव से  वे गीत पर कार्य कर रहे हैं, वह विरल और वंदनीय कार्य है। वे अपनी संघर्षशीलता और संकल्प के माध्यम से ही इतना बड़ा काम कर पाए हैं। वे श्रेष्ठ गीत परम्परा की जो मशाल जलाए हुए हैं तथा हिन्दी गीत का परचम थामे इस कविता के दौर में निरन्तर अग्रसर हैं इसलिए छायावादोत्तर गीत के विकास में गौड़ जी एक महत्वपूर्ण कवि के रूप में सदैव जाने जाते रहेंगे।

सारांशतः गौड़ जी के गीत ईमानदार शब्दों में, ईमानदार मन की, ईमानदार अभिव्यक्ति हैं। उनकी काव्य–सम्पदा हिन्दी साहित्य की मूल्यवान धरोहर है जिसे सहेजा जाना चाहिए । इनकी रचनाओं का नए सिरे से अध्ययन किया जाना चाहिए क्योंकि हिन्दी गीत–यात्रा में पंडित मधुकर गौड़ एक मील के पत्थर हैं, जहाँ से गीत के विकास को आगे रेखांकित किया जाएगा।
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गीत- नवगीत संग्रह - गीताम्बरी, रचनाकार-  मधुकर गौड़, प्रकाशक- मरुधारा प्रकाशन, मुंबई । प्रथम संस्करण- २०१६, मूल्य- १५००  रुपये, पृष्ठ-७४०, समीक्षा- हरेराम समीप।

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